कविता
लिखी नहीं जाती
स्याही से
कविता
लिखी जाती है
भावों से
अभावों से
आहों से
आंसू से
विकल मन
जिज्ञासु से।
कविता कवि के कंठ
से निकली
वो गंगा है
जो हर दिन
एक नई वोल्गा
में मिल जाती है।
लेकिन कभी
समन्दर में
नहीं बहती।
कविता का अंतिम
ठिकाना
आज तक
ज्ञात नहीं।

