रात के सन्नाटे में हर रोज़,
कोई न कोई आवाज़ सुनाई देती है ,
सुनी सुनी सी लगती है वो आवाज़ ,
नींद में जो ख़लल डाल जाती है |
कभी माँ की आवाज़ सुनाई पड़ती है,
मुझे बुलाते हुए खाना खाने के लिए,
कभी बहन की आवाज़ होती है,
पापा से मेरी शिकायत करते हुए,
कभी कोई दोस्त पुकार रहा होता है ,
कोई किताब लौटाने के लिए,
कभी कोई और बुला रहा होता है,
न जाने किस काम के लिए,
वक़्त तो बीत गया बहुत पहले,
पर कुछ आवाजें अभी बाक़ी हैं ,
मेरे ज़हन में जो गूंजा करती हैं ,
कुछ भूला बिसरा याद दिलाया करती हैं |
अब नींद कहाँ आती है ,
बस आँखें मला करते हैं ,
और सो जाने का नाटक किया करते हैं |
दिन में काम में उलझे रहते हैं,
और रात में यादें मशग़ूल रखती हैं ,
बहुत याद आता है सब कुछ पुराना ,
दिल दुखा जाता है,
हर वो बीता हुआ अफसाना ,
ज़िन्दगी रुक ही क्यूँ न गयी ,
सोचते रहते हैं बस यही,
क्यूँ बढ़ गए आगे,
छोड़ के पीछे सब वही,
कभी तो वापस भेज दो ,
जाने अनजाने में ही सही ,
शहर जो मेरा पीछे छूटा,
वो गलियाँ, वो सड़कें, वो मेरा बसेरा,
वो दोस्त, वो यार, वो पहला प्यार ,
रोशन था मेरा वो जहां ,
नहीं था ज़रा भी अँधेरा ,
अब तो बस ज़िंदा ही हूँ,
जीना तो भूल ही गया ,
ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ ,
मुस्कुराना तो भूल ही गया ,
दिमाग़ी उलझनों से जूझ रहा हूँ ,
दिल लगाना तो भूल ही गया |