जान गए जब वो लोग, कि है कोख में एक बेटी, जन्म से पहले ही लगा दी रोक, नन्ही साँसों पर उसकी | अगर वह पैदा हो भी गयी, जी पाई केवल कुछ ही क्षण, फिर धड़कन उसकी कर दी गयी बंद | नसीब से अगर वह बच भी गयी, तो तानों से ही मार दी गयी | रखा उसने जब पहला कदम, उस दुनिया में जिससे थी वह अनजान एकदम, पाया जहाँ उसने खुदको अकेला हरदम, लड़ने को थी वह पूरी तैयार, नहीं था उसे हार जाने का ग़म | आग में तपके बनी वह फौलाद, खुली हवा में थी वह आज़ाद, न ही डर था किसी का न कोई पश्चाताप, बस आँखों में उसके थे सपने हज़ार, और मन में उसके था विश्वास | कोई आंधी न रोक पाई उसे, रोक न पाया उसे कोई तूफ़ान, राह में उसके थे अनेक कांटे, अपनों ने ही जो बोये थे, उसने सबको फूल बांटे, मिले उसे जो हर मोड़ पे | एक बेटी ही तो थी जिसने, बचाई करोड़ों की लाज, जीते पदक ओलंपिक में, सजाया देश के सिर पे ताज | कैसे भूलोगे उन बेटियों के उपकार, सौ जन्म लेकर भी, नहीं कर पाओगे उनका सत्कार, क्या मानोगे तुम उनका एहसान, कर पाओगे इतना बलिदान | चुका पाओगे ऋण उस कोख का, जिसने तुम्हे है जन्म दिया, वह सिर्फ एक बेटी ही नहीं, वह माँ भी है, और बहन भी, वह पत्नी भी है और जननी भी | अगर वह एक माँ बनी, तो सींचती है अपने खून से, करती है पालन बिना किसी स्वार्थ के, अगर वह एक पत्नी बनी, तो संजोती है अपने प्रेम से, छोड़ कर अपना सब कुछ पीछे, आती है वह परायों के बीच, क्या खूब निभाती है वह हर रीत | अगर कुछ दे सकते हो उसे, तो बस दो उसे पूरा सम्मान, लाज ही तो है उसका सबकुछ, मत करो उसका अपमान | जीने दो उसे अपने मन से, मत छीनो उसका अभिमान , मत थोपो उसपे अपने विचार , बनने दो उसकी अपनी पहचान | वह पंछी है खुले आसमान की, किसी कठपुतली की डोर नहीं, मत बांधो उसे समाज की बेड़ियों में, उड़ने दो उसे मत रोको, वह कोमल है , कमज़ोर नहीं , वह कोमल है , कमज़ोर नहीं |