जब था मैं माँ की कोख में ,
हो रहा था जब मेरा निर्माण ,
थीं मेरी भी कुछ आशाएं,
थे मेरे भी कुछ अरमान ,
बनाया गया मैं रहीम या राम ,
जबकि बनना चाहता था मैं एक इंसान ,
खोली थीं जब मैंने अपनी आँखें,
देख न पाया था मैं कहीं भगवान,
क्योंकि उसे भी बाँट चुके थे ये शैतान |
नन्ही आँखों से जब मैंने देखा ये संसार ,
ढूँढ न पाया मैं कहीं प्रेम या परोपकार ,
हर तरफ देखा सिर्फ नफरत का अम्बार ,
धर्म के नाम पर मचा हुआ था हाहाकार |
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या हो गुरुद्वारा ,
घर तो था उस परमात्मा का,
परन्तु बना दिया विषय इन्हें ,
राजनीति, लोभ एवं स्वार्थ का |
है अति आवश्यक कि एक बार ,
खोलें हम अपने ह्रदय के द्वार ,
और आने दें भीतर उन्हें,
जो हैं मन के उस पार |
मिलकर लेना है हमें ये प्रण,
कि बनाना है एक ऐसा संसार ,
बाँट न पाये जिसे नफरत का कोई बाण,
होगा भरा मानवता के समर्थकों से ,
न कि धर्म के ठेकेदारों से |
देख के दुनिया ऐसी कहेगा ऊपरवाला भी ,
कि नहीं आवश्यक अब स्वर्ग मेरा ,
धरती पर है जब इंसानों का बसेरा |