
मेरे महबूब की यादें, कुछ यूँ नूरानी हो गई...
सुने कुछ किस्से, जैसे कोई कहानी हो गई...
मेरे जेहनो- दिल में बसी वो...
दास्ताँ- ए- इश्क़ की अजब रवानी हो गई...
ज़र्रे- ज़र्रे में वो तलाश आज पुरानी हो गई...
जैसे मैं राह की मुसाफ़िर खानदानी हो गई...
दर- ब- दर कुछ भटके यूँ...
कि मैं ख़ुद से ख़ुद ही बेगानी हो गई...
वो चाँद मैं चाँदनी सी रूहानी हो गई...
मेरे प्रीतम की वो प्रीत सुहानी हो गई...
बरसों बाद मिली सागर से...
बुझी प्यास, और मैं सुरानी हो गई...
इक तेरे इश्
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