कविता


शीर्षक : मनुष्य अब ठहर जा


इक्किस दिन के लॉकडाउन ने, जीवन का महत्व समझाया है

काम करियर तो हमेशा ही था, पर जीवन व्यतीत करना कोरोना से समझ आया है


तू अकेला है, क्योंकि एक दूसरे इंसान से मोहब्बत ना कर सका

आज घर पर अकेले होकर, शायद एक इंसान को इंसान की कद्र करना आया है


घर में बंद होकर, शायद तुझे ज़ू के पशु-पक्षियों का ख़याल आया है

हर चीज़ की अति देख शायद, धरती माँ ने ये कदम उठाया है


भूमि, जल और वायू को, तू ही प्रदूषित कर पाया है

हिमालय क्या, तूने तो अंतरिक्ष में भी कचरा फैलाया है


स्त्री को पैदा होने से मरने तक, तूने सिर्फ़ तड़पाया है

इसलिए गांधारी ने आँखों पर पट्टी और सीता माँ ने धरती में समाना बेहतर ऑप्षन पाया है

परमेश्वर ने पेड़-पौधों, फलों और पर्वत-नदियों से इस धरा को सज़ाया है


पर अकेला तू प्राणी ही है, जिसने उसे भी नष्ट करके दिखाया है

मूर्ति में ईश्वर माना मगर, अपने जैसे जीव-जन्तु को तूने अपना भोजन बनाया है


एक इंसान की ग़लती से, सारा जीवन संकट में आया है, 

सारा जीवन संकट में आया है 


- महिमा