लिखते समय हम हमारे नहीं रहते,
कुछ ऐसा होता है कि सामने एक आदमी तो कभी औरत बैठ कर ठीक बगल से मेरे कान में फुसफुसाते हैं और मैं पूरा ध्यान टाइप करने पर केंद्रित कर देता हूँ,फिर अचानक वो उठ कर चले जाते हैं और मैं ऐतराज़ नहीं करता,आगे कभी लिखने का सोच कर टाइप राइटर को गिलाफ से ढँक कर छोड़ देता हूँ, और फिर यही प्रक्रिया ख़ुद ही कुछ सेकंड,कभी कुछ मिनट तो कभी कुछ घंटे,दिन,महीने,बाद अपनी पुनरावृत्ति करती है।
✍महफूज़ निसार ©


