एक बार अगर अपना समझ,
तुम हाल मेरे दिल का पूछते।
तो मेरे दर्दे दिल के सागर में,
तुम्हें दफन मेरे सपने मिलते।
ना वक्त दिया ना सोचा समझा,
पल भर में मुँह फेर लिया।
उन आंँखों को कैसे समझाओगे,
जिन्होने अक्सर मेरा इंतजार किया।
तुम मानो ना मानो सच यही,
यह वक्त तुम्हें समझाएगा।
दो कदम अगर तुम बढ़ाओगे,
फासला ऐसे ही मिट जाएगा।
तुम अपने दिल की सुनते कहांँ हो,
ना मेरे दिल की परवाह है।
तुम जीना चाहते हो "आज" में,
मुझे मेरे "कल" की चिंता है।
डाॅ. महेश®बालपांडे, तुमसर
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