यूँ तो कई मर्तबा सुना हूँ...ये "हाँ " शब्द..
पर तुम से...कभी नहीँ..
क्यू इतना बड़ा होता है ,ये हाँ शब्द...इसे और छोटा होना चाहिये..
और थोड़ा सरल भी....ताकि बोलते बोलते रुकने की गुंजाइश न रहे...
बहूत मुशीबत में डाल देता है..
ये "हाँ " कभी..कभी..
बगैर कुछ कहे...रोज़ लौट जाती हो तुम...
और...मै हर रोज़ तुम्हारी खामोशी की व्याख्या...
अपने पक्ष में कर लेता हूँ...
सुनो..
गर..मेरे हक में तुम्हे न भी देना हो...अपना फैसला..
तो बेहतर है...तुम यूँ ही मुस्कुराते रहना..
दोनो के खुश रहने के लिये....
ज़रूरी है तुम्हारा
#different_dhruw