"तुम्हारा" ख़याल....जैसे बारिश से काँपते बदन में...
गर्म चाय जैसा उतर आया जहन में...
और जैसे लगा की,
कोई आग सा लगा गया...भीगते मौसम में...
एक सुस्ती सी छायी थी मेरे भीतर ,
तुम्हारे खयालों से ...आयी रफ्तार धड़कन में ...
हर तरफ़ उदासी भीगे सड़कों सी थी ,डर था गिरने का ..
तुम्हारे खयालों ने थामा ऐसे...जैसे थाम ले कोई फिसलन में ...
तुम्हारा ख़याल मुझे, खुद से बेपरवाह कर देती है ..
जैसे लौट आया हूँ मैं ...अपने बचपन में ...
ख़याल तुम्हारा तो मुझमें घर कर गयी हैं ...
मगर तुम आज भी हो कोई ...अड़चन में ...