उम्र कितनी हो, बातों में असर चाहिये,
जज़्बातों को पढ़ने की नज़र चाहिये।
यूँ ही नहीं कोई मशहूर होता है,
जीत की चाह है तो लड़ने का हुनर चाहिये।।
आज बरसात में वो भीगी सर से पाँव तलक,
उसको अब ख़ुश्क मौसमों का शहर चाहिये।
अगर है छाँव का आशिक़, तो चार पेड़ लगा,
तुझे महल मुबारक़, परिंदों को बसर चाहिये।।
आईने कब के तोड़ डाले मैंने सच वाले,
कि मेरे झूठ पर बरसना क़हर चाहिए।
कहीं मिलेंगे यही वादा था, इरादा था,
ख़त्म होना दिलों की दूरी का सफर चाहिये।।
#महेन्द्र सिंह राजपूत


