जो ख़ुद अपनी निगाहों में गुनहगार है,
किसी और गवाही का क्या हक़दार है।
आज सुबह बड़े काम का लगा था मुझे,
शाम रद्दी टोकरी में वो अख़बार है।।
वो कहता है दो गज दूरी बनाके रखो,
तीन दिन से मुझे हल्का सा जो बुखार है।
कोरोना क्या बला कुदरत लेकर आई है,
आधी दुनिया केवल मन से ही बीमार है।।
तारीखों को भूलने वाले सज़ा पाएगा तू,
वक़्त किसका हुआ है, कौन इसका यार है।
बड़ी सफाई से कर डाले दिल के टुकड़े कई,
उसकी बातें हैं या धारदार कटार है।।
लोगों को उसने भरमा रखा है ये कहकर,
देवता उसकी पूजा का ही तलबगार है।
भरोसा रख तेरी फरियाद भी सुनेगा वो ही
बंदा बनकर चला तो आ वो बंदानवाज़ है।।
महेन्द्र सिंह राजपूत


