मंद-मंद हाथों के फेरे, गोद का वो पालना,

कभी ज़मीं पर जो गिर जाऊँ, आकर तेरा संभालना,

हँसकर कहती "दीप" मेरा तू कितना चंचल है,

माँ तू कितनी शीतल है। माँ तू कितनी शीतल है।।


तेरे लिये स्वर्ग की खुशियाँ कमतर मेरी मुस्कान से,

माँगी आशीष मेरे लिए मंदिर में भगवान से,

चूमा हँसकर तुमने जिनको वे ललाट उज्जवल हैं,

माँ तू कितनी शीतल है। माँ तू कितनी शीतल है।।


निष्ठुर हो जाये जब धरती, आँचल का तेरे छाँव है,

तेरी ममता बिना ये दुनिया सर्पों का जैसे गाँव है,

मेरे बिना हृदय तेरा हो जाता विकल है,

माँ तू कितनी शीतल है। माँ तू कितनी शीतल है।।


कंटक चुभे न पग में सोचकर फूल बिछाती है,

अंधियारे में न गिर जाऊँ, सो दिया जलाती है,

हृदय तेरा कितना विशाल और कितना निर्मल है,

माँ तू कितनी शीतल है। माँ तू कितनी शीतल है।।


#महेन्द्र सिंह राजपूत