सिसक-सिसक बालों की सफेदी, बोले चीख के आँसू,
ममता के असीम विस्तार के लिये बन गई सासू।
अब तू छुप-छुप क्यों रोती है,
माँ तू बूढ़ी क्यों होती है ।।1।।
दीप जलाया एक दिन तूने वो अब भी जलता है,
फिर निःस्वार्थ तेरा आँगन क्यों अंधेरों में पलता है।
गंगा होकर भी सबका मैला क्यों ढोती है,
माँ तू बूढ़ी क्यों होती है ।।2।।
कहती थी कि चाँद छिटक आया मेरे आँचल में,
बासंती किरणों सा सुख पाती मुख निर्मल में।
करुणा के सागर से अब झड़ते क्यों मोती हैं,
माँ तू बूढ़ी क्यों होती है ।।3।।
जिस मूरत में रंग भरा, तुझे वो बदरंग कहे है,
कोयल की कुहू-कुहू के आदी, कर्ण कटार सहे हैं।
मिश्री घोल के भी तू सुनती क्यों खरीखोटी है,
माँ तू बूढ़ी क्यों होती है ।।4।।
अमृत बीज डालकर भी तू, फसल विष के काट रही,
कंकड़ खुद के आँचल में चुन, हीरे बाँट रही।
डाल स्नेह के खाद, पौध ममता के बोती है,
माँ तू बूढ़ी क्यों होती है ।।5।।
महेन्द्र सिंह राजपूत


