महका-महका मेरा रस्ता आज है क्यों,
बिन छेड़े ही सरगम, बजता साज़ है क्यों,
शाख पे बैठी कोयल जब भी कूकती है,
दिल को लगती तेरी आवाज़ है क्यों।।
बदला-बदला मौसम, बदली-बदली फ़िज़ा,
इतनी गर्मी में भी ये बरसात है क्यों,
हर इंसाँ की साँस में घुलती एक हवा,
फिर भी दिल को अलगाती ये जात है क्यों।।
पत्थर को भी मिट्टी करते कहाँ हैं हल,
ट्रैक्टर से छलनी धरती की छात है क्यों,
पनिहारन के घड़ों को किसने तोड़ दिया,
सूनी-सूनी नदियाँ, सूने घाट हैं क्यों।।
मैं भी तन्हां-तू भी तन्हां, मिल जाते दोनों,
सबकी अपनी ढपली, अपना राग है क्यों,
बच्चे छत के ऊपर मिलजुल खेल रहे,
जो बच्चों में नहीं वो हममें बात है क्यों।
मुझसे ना तुम, मैं भी तुमसे नहीं ज़ुदा,
फिर भी डरे-डरे से ये अहसास है क्यों,
मेरा भी तो मन चाहे उड़ना आकाश,
मेरे मन से छोटा ये आकाश है क्यों।
मेरे मन से छोटा ये आकाश है क्यों।।
महेन्द्र सिंह राजपूत


