चलो हम भी बनाएँ घोंसला,

सिर्फ़ तिनके से नहीं बनता ये,

आकाश भर चाहिए हौसला।

चलो हम भी बनाये घोंसला।।


वो उड़-उड़ के जाती है,

तृण लेकर वापस आती है,

जाने कौन पता देता है उसको।

जाने कौन बता देता है उसको,

कि कारीगरी इंसानों की बपौती नहीं।


ये उपहार है कुदरत का,

ये व्यवहार है कुदरत का।

सब कुछ होकर भी नहीं कुछ,

और कुछ न होकर भी सब कुछ।

वो छोटी नन्हीं चिड़िया सब सिखाती है।

अपना सम्पूर्ण विज्ञान प्रकृति से पाती है।


क्या हमने सीखा घोंसला बनाना,

नहीं, हमने सीखा हौंसला गिराना।

क्योंकि हम तो इंसान हैं,

हम बहुत बलवान हैं।

है न, ताक़त ही तो पहचान है हमारी,

नन्हीं चिड़िया को डराना ही तो शान है हमारी।


वो अब अकेले निकलने से डरती है,

चुगने से डरती है, फुदकने से डरती है,

छोटे परों की लंबी उड़ान से डरती है।

फिर कैसे बुनेगी वो घोंसला।

वो तभी बुन पाएगी जब हम देंगे हौंसला।

इसलिये चलो हम भी बनाएँ घोंसला।।


#महेन्द्र सिंह राजपूत