
चलो हम भी बनाएँ घोंसला,
सिर्फ़ तिनके से नहीं बनता ये,
आकाश भर चाहिए हौसला।
चलो हम भी बनाये घोंसला।।
वो उड़-उड़ के जाती है,
तृण लेकर वापस आती है,
जाने कौन पता देता है उसको।
जाने कौन बता देता है उसको,
कि कारीगरी इंसानों की बपौती नहीं।
ये उपहार है कुदरत का,
ये व्यवहार है कुदरत का।
सब कुछ होकर भी नहीं कुछ,
और कुछ न होकर भी सब कुछ।
वो छोटी नन्हीं चिड़िया सब सिखाती है।
अपना सम्पूर्ण विज्ञान प्रकृति से पाती है।
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