अगर वो चाहते हैं मुझसे कोई बात न हो,

दुआ करे कि सरेराह मुलाक़ात न हो।

उसे न क़ायदे से खेलना आया अब तक,

कैसे मुमकिन है कि शतरंज़ में शह या मात न हो।।


नदी को रोक लूँगा मुट्ठी में कहता है,

उसके शहर में जब भी अच्छी बरसात न हो।

जुगनुओं तुम भी बड़ी भोली बात करते हो,

चाहते हो तुम्हारे टिमटिमाने से रात न हो।।


मिलाके दिल झुकाते हैं नज़रें इस तरह,

कि जैसे हालत का हमको अहसास न हो।

अपनी धड़कनों को बात ज़रा समझा दो,

रुके न तब तलक जब तक कि मुझमें श्वांस न हो।।


#महेन्द्र सिंह राजपूत