आ जाओ...!
कि गुज़र गई है बरसात,
जिसमें साथ भीगकर मन से
लोकलाज का झूठा भय
मुझे बताने की असफल कोशिश
करती थी तुम्हारी आँखें।
आ जाओ...!
कि वो आँखें देखे अरसा बीत गया
जो रास्ते पर खड़ी होती थी
और उठती थी मुझे देखने,
लेकिन फिर सहेली के कंधे पर,
बालों की ओट में
छुप भी जाती थी।
आ जाओ...!
कि अब वो रामलीला
भी पूरी हो गई है हमारे गाँव की,
दशहरे का मेला,
रावण के सिर गिनते
खत्म हो गया,
लेकिन खत्म न हुआ इंतेज़ार?
आ जाओ...!
कि पीपल के पेड़ पर
पतझड़ आने वाली है।
वो चिड़िया जिसने पिछली बार
तुम्हारी गवाही में घोंसला बुना था,
अब उसके बच्चों के पंख
उनमें उड़ने का हौसला भर चुके है।
आ जाओ...!
कि अब कोई सच्ची कसमें
नहीं खाता तुम्हारी तरह।
हर कोई झूठ का लबादा
ओढ़े खुद ही दबा जा रहा है।
आ जाओ...!
कि अब थाम लो
इन थके हाथों को
चूम लो इन पथराई आँखों को,
डूब लो
मन की पीड़ा के समंदर में,
भीग लो
प्रेमभावों की बारिश में।
आ जाओ...बस आ जाओ...!
#महेन्द्र सिंह राजपूत


