विश्व में भाषाई व सांस्कृतिक विविधता को सरंक्षित करने व बहुभाषावाद को प्रेरित करने के लिए यूनेस्को द्वारा वर्ष 1999 में 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया गया था।

आधुनिकवाद की होड़ में विश्व की अधिकतर मातृभाषाओं पर संकट है। मातृभाषा हमारे विचारों के प्राकृतिक प्रवाह का साधन होती है। हमें भारत की भाषायी व सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करना होगा क्योंकि मातृभाषा किसी क्षेत्र विशेष की पहचान होती है। 

आज मातृभाषाओं पर दुष्प्रचार का भी संकट है। किसी राष्ट्र में एकल भाषा को स्थापित करने की मंशा से उस राष्ट्र की मातृभाषाओं का समाप्त होना तय है।

राजस्थान के लोगों की मातृभाषा, राजस्थानी भाषा का ही उदाहरण लें। राजस्थानी भाषा का साहित्य 15वीं शताब्दी से मिलना शुरू होता है। भारत पर औपनिवेशिक शाशनकाल में राजस्थानी भाषा पर विश्व के महानतम भाषाविदों ने शोध किया, जिससे विश्वभर में यह भाषा स्वतंत्र व समृद्ध भाषा के रूप में उभरी। 1908 में प्रकाशित हुए इम्पीरियल गेजेटियर ऑफ इंडिया में राजस्थानी भाषा को राजपूताना में बोली जाने वाली स्वतंत्र व प्रभावी भाषा माना गया जिसका विस्तार औपनिवेशिक भारत के मध्य भू-भाग से दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्रों की समुंद्री सीमा तक था। 1908 में डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन नें भारतीय भाषायी सर्वेक्षण में राजस्थानी पर विस्तृत शोध प्रकाशित किया जिसमें राजस्थानी भाषा को अन्य भाषाओं से स्वतंत्र माना गया व राजस्थानी भाषा के नमूने प्रकाशित हुए। इसके सात वर्ष बाद इटली के डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी नें राजस्थानी भाषा का ऐतिहासिक व्याकरण प्रस्तुत किया। 1970-80 के दशक में शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कालीचरण बहल नें आधुनिक राजस्थानी पर विस्तृत शोध प्रकाशित किया। आज शिकागो विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा के 11 लाख से अधिक शब्द संरक्षित है।

संविधान सभा की बैठक (संविधान का मसौदा: अनुच्छेद 14-क पर विचार) में हुई चूक को राजस्थान भुगत रहा है, दरअसल 14 सितंबर 1949 को राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलते-मिलते रह गयी। भारत संघ की प्रस्तावित भाषाओं में गोकुल भाई भट्ट व अन्य सदस्यों के एक संसोधन प्रस्ताव से राजस्थानी भाषा को शामिल किया गया था पर इसके पक्ष में तर्क रखने के दिन राजस्थान के 17 नुमाइंदे अनुपस्थित थे। नतीजतन राजस्थानी भाषा के अलावा सभी भाषाओं को सूची में जोड़ लिया गया। गोकुल भाई भट्ट नें 18 नवम्बर को तर्क दिए पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

1951 की भारतीय जनगणना में राजस्थानी भाषा व इसकी बोलियों को हिंदी से स्वतंत्र माना गया। उस समय राजस्थानी मातृभाषी वक्ताओं की संख्या 1 करोड़ 6 लाख थी जबकि हिंदी (जिसमें पश्चिमी हिंदी, खड़ी बोली, ब्रज भाषा व उर्दू शामिल थी) के वक्ताओं की संख्या 33 करोड़ ही थी। यही स्थिति 2011 की भारतीय जनगणना में भी बरकरार थी। उस समय केवल राजस्थान में राजस्थानी मातृभाषी वक्ताओं की संख्या 5 करोड़ थी जबकि हिंदी के वक्ताओं की संख्या सिर्फ 1.8 करोड़ के लगभग थी। राजस्थान सरकार द्वारा सर्वसम्मति से 2003 में राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था जिस पर आज तक केंद्र सरकार द्वारा कोई विचार नहीं किया गया। राजस्थानी मातृभाषी वक्ताओं के साथ आजादी उपरांत से ही अन्याय ही हुआ है। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि राजस्थानी भाषा, केंद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली में सम्मलित 24 भाषाओं में से है, इन भाषाओं में अंग्रेजी के अलावा राजस्थानी ही एकमात्र भाषा है जिसे संवैधानिक मान्यता नहीं है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग राजस्थानी साहित्य में शोध करने के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप प्रदान करती है। भारत के बाहर, नेपाल देश में राजस्थानी भाषा को मान्यता है व अमेरिका की सेंट्रल लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में राजस्थानी साहित्य संरक्षित है।

राजस्थानी भाषा पर 1971 के बाद राजनितिक षड्यंत्र हावी हुए। इस समय के बाद राजस्थानी भाषा को हिंदी की बोलियों में शामिल किया जाने लगा। राष्ट्र में भाषायी एकरूपता की मंशा इस कदर हावी हुई कि राजस्थानी की अनेक बोलियां नष्ट हुई। आज भी राजस्थानी भाषा को मान्यता न मिलना राजस्थान के लोगों के अधिकारों का हनन ही है।

शिक्षाविदों के अनुसार बच्चों को शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिये। शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 व भारतीय संविधान का अनुच्छेद 350(अ) भी मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान करता है पर आज तक राजस्थान के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में शिक्षा से वंचित है।

राजस्थान की विशेष सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए भारत सरकार को राजस्थानी भाषा व अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति उदार होना चाहिए साथ ही हमें चाहिए कि हम अपनी मातृभाषा को विशेष सम्मान दें व अपनी विशेष पहचान को संरक्षित करें।