मत ठिठक क्यों रहा भटक करता काहे मन को अधीर। वक्त गुजरता है गुजर जाएगा हर पीर को, बन जा सुभिर।।

करता विलाप वह है जिसने परिस्थिती को ना पहचाना है हतप्राय हो हतप्रभ देखता औ करता मर्दन जमाना है रखता प्रज्जवलित जो ललक करता निष्कर्षित पाहन से नीर। वक्त गुजरता है गुजर जाएगा हर पीर को, बन जा सुभिर।।

है स्थिरता कहां जग मे अरे! नभ भी शून्य मे भ्रमाता है। असहाय मान न चलता जो खुद शून्य मे भटका पाता है किया प्रण जिसने दृढ़निश्चयी हो पाता स्वयं सागर का तीर वक्त गुजरता है गुजर जाएगा हर पीर को, बन जा सुभिर।।