तुम से मिल कर ये जाना, मैं खुद से मिली हूँ, 

फिर पंख फैला , गगन छूने चली हूँ, 

हो गयी थी जो तस्वीर बेरंग कभी की ,-2

उस तस्वीर मे रंग भरने चली हूँ ,


देखती हूँ स्वयं में तुमको सनम, 

मैं तुमको निगाह मे छुपाने चली हूँ, 

तन मिले ना मिले हमको परवाह नहीं -2

मैं रूह को रूह से मिलाने चली हूँ, 


यूँ तो महफिल मे होते है सब साथ मे, 

मै तनहाई में साथ देने चली हूँ, 

रोशनी मे तो साया भी साथ होता सनम -2 

हो अंधेरा तो दीपक जलाने चली हूँ, 


बंध गया जो ये बंधन परिणय सनम 

मैं सप्तवर्णी में इसको बनाने चली हूँ 

कोई रहे ना रहे कभी साथ तेरे 

हर कदम पर मैं साथ निभाने चली हूँ, 


माधवी हरितस