वो मिट्टी का आँगन 

अम्मा ने लगाया था 

जहाँ एक तुलसी का पौधा 

वही एक रात जलाये

थे मैंने तुम्हारे पुराने

सारे खत !! 

आज देखा 

ना जाने कैसे 

एक नन्हा सा काँटे 

का पौधा पनप रहा है वही

जब जब छूती हूँ

चुभ सा जाता है

याद में तेरी अब अक्सर 

वही बैठती हूँ

आँसूओं से उस काँटे 

को सिंचती हूँ

उसको अपनी उंगलियों 

में चुभाती हूँ

रक्त की उस बूंद को

फिर माथे पर

सजाती हूँ

आंचल से ढक कर

उसे फिर सबसे

छुपाती हूँ .....


~मधुलिका