शायद उसके पन्नों में हो ज़िक्र
मेरे बहते आँसुओं का...
ज़िक्र हो मेरे टूटे दिल के टुकड़ों का
जो उसके पैरों से रौढें गये...
ज़िक्र हो उसके पन्नों में
मेरी होठों की ख़ामोशी का
जिसको उसने अपने झूठे वादों और इरादों में फ़सा के
बोलते होठों पे दर्द की दस्ता लिख दी.
ज़िक्र हो मेरी टूटती हर उम्मीद का
जो उसने अपनी फ़रेबी बातों से
ज़र्रा ज़र्रा तोड़ दी.
ज़िक्र हो शायद उसके पन्नों में
मेरी इंतज़ार की घड़ियों का
जिसने हर बीतते लम्हों को
एक लंबी कहानी में तब्दील कर दिया!!
मधु गुप्ता "अपराजिता"

