सब अपनी मर्ज़ी के यहाँ मालिक हैं।
कौन सोचता हैं कौन कितना घायल हैं।।
सभी चेहरों पे लगे हैं मुखौटे फ़रेब और झूठ के।
हकीक़त की जमीं से यहाँ कौन किस से वाकिफ़ हैं।।
दौड़ रहे सभी अपनी खुशियों की तलाश में।
दर्द से कौन बेचैन किसी को कहाँ मालूम है।।
हैरान ना होना लोग के बदलते हुए मिजाज़ से।
यक़ीं के ख़ून का पानी होना यहाँ लाज़िम हैं।।
मधु गुप्ता "अपराजिता"


