मिला था उसको भी कोई मिला था मुझको भी कोई ।
मग़र क्या दिल का ख़ाली-पन भर सका था और कोई।।
एक ही मंजिल के हम रही मग़र रहे जुदा क्यों है।
सागर में उठती लहरों के आखि़र किनारे अलग क्यों हैं।।
उजड़े हुए चमन में बहारों ने फिर से अपनी दस्तक सुनाई है।
भंवरों ने भी फूलों पे बैठ कर फ़िर से हलचल मचाई हैं।।
कफ़स से निकलकर परिंदों ने आसमान छूने की जुर्रत उठाई है।
देख कर, मुर्दा पड़े इंसानों में फ़िर से जीने की कशिश आई है।।

