रूठे गए जो तुम इक बार तो जान से जाएंगे हम।फिर पिघलती शम्मा' की तरह ना हाथ आएंगे हम।।सख्त बहुत है दिल की ज़मीं फूल कैसे खिलाएंगे हम।तन्हाइयों के साये में आ कर पत्थर बन जाएंगे हम।।मधु गुप्ता "अपराजिता"