यह जिंदगी का कैसा खेल है प्यारे
यहाँ बस झूठ और फ़रेब का मेल हैं प्यारे
सच चढ़ जाता हैं झूठ की शूली पे मेरे प्यारे
रह जाता हैं तब दर्पण तुझ पे हँसता हुआ प्यारे
तब कोई तरकीब कोई हादसा ना काम आता हैं प्यारे
झूठ के सामने सच बेबस नजर हो जाता है प्यारे
झूठ के हैं अनगिनत तमाम चेहरे इस जहाँ में प्यारे
मगर सच का सिर्फ एक ही रंग नजर आता है मेरे प्यारे
मुश्किलें कई झेलता है पर हार नहीं मानता है प्यारे
सो अंत में जीत की कसौटी पर सच खरा उतरता है प्यारे।।
"अपराजिता"

