समेट लाई हूँ वो सारे फूल जो बिख़रे पड़े थे ज़मीं पे।
लहू लुहान कर गए थे वो कांटे जो लिपटे हुए थे उन्हीं से।।
फूल की हर एक पंखुड़ी कराह रही थी काँटों की चोट से।
फ़िर भी फूल मुस्करा रहा था हाथों में किसी और के।।
मधु गुप्ता "अपराजिता"

समेट लाई हूँ वो सारे फूल जो बिख़रे पड़े थे ज़मीं पे।
लहू लुहान कर गए थे वो कांटे जो लिपटे हुए थे उन्हीं से।।
फूल की हर एक पंखुड़ी कराह रही थी काँटों की चोट से।
फ़िर भी फूल मुस्करा रहा था हाथों में किसी और के।।
मधु गुप्ता "अपराजिता"