कैद कर क़फ़स में हमको ख़ु द परिंदे सा वो उड़ता है।

ज़माने का यही शौक हैं गरीबों को वो ऐसे ही छलता हैं।।


दिखता है ख़्वाहिशें आसमां की जमीं पे चलने भी नहीं देता है।

यह कैसा चलन है दुनिया का हमारे होने का पता भी नहीं देता हैं।।

मधु गुप्ता "अपराजिता"