"सफेद जोंक"

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शोर-तमाशा होगा फिर से 

जुलूस निकलेंगे, रैलियाँ निकलेंगी....

फिर से सफ़ेद लिबासिए हाथ जोड़ेंगे,

झूठे वादों की बिल्डिंगें बनाएंगे

और उनके साथ बैठकर खाना भी खाएंगे वो सफेद गिद्ध...

हाँ फिर शुरू होगा राजनीति का महाकुंभ एक बार,

धर्म,जाति, सम्प्रदाय के नाम पर फिर से छली जाएगी मुफ़लिस जनता और एक बार....

अरे जनता नहीं भेड़ है ये

सोयी हुई भेड़....

ग़रीबी ने इन्हें भेड़ बना दिया,


ग़रीबी हमारे देश में.....

नहीं नहीं... एक भी ग़रीब नहीं यहाँ

क्योंकि आंकड़े तो हमें अमीर बोल रहे,

फिर से कौन लोग जो ख़ुद को ग़रीब बोल रहे....

वो रामू रिक्शावाला,वो कलुवा आँफर (लोहार) वाला...

वो सूखा रेड़ीवाला...वो झाडूवाली रामकटोरी...

कौन है आख़िर वो ग़रीब??? 


नहीं हम नहीं जानते...

"विकास"...

हाँ इसी अमीर को हम पहचानते...

टूटा है छप्पर चू रहा पानी,

देखो सावन की कैसी मनमानी...

लोकतंत्र बना है जोंकतंत्र,

चूस रही सफ़ेद जोंकें/

धीरे-धीरे लोक का ख़ून,

गंजी भेड़ें हो गईं उड़ गया ऊन। 

"अच्छे दिन" यही हम जानते....

सुनो अच्छे दिन आ गए...

देखो ना कितने अच्छे दिन....

घूम रहे सब बेरोज़गार, नौकरी के बिन,

रातें तो अँधेरी थीं ही देखो स्याह हो गया दिन।

फिर भी देखो ना मेरा देश दमक रहा है...

सूरज के जैसे नहीं और भी ज़्यादा चमक रहा है।


©®सुधा जोशी"रजनी"

   रानीखेत(उत्तराखण्ड)