चलो पहाड़ बोते हैं

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लग गए जिन घर-बाखलियों में अब ताले,

लगा दिए जहाँ मकड़ियों ने अब जाले....

चलो अब उन बिखरे स्वप्नों को संजोते हैं।

चलो मेरे शेरपा के बच्चों पहाड़ बोते हैं।

जहाँ कभी पुरखों ने आबाद किए थे स्यारे,(खेत)

देखते-देखते अब जो बंजर हो गए सारे...

जहाँ कभी ठंडे पानी के बगते(बहते)कल-कल धारे,

शहरी चमक में खो गए अब जो पहाड़ी लोग हमारे/

पहले हँसते लोग जहाँ थे अब उदास झींगुर रोते हैं,

चलो मेरे पहाड़ के लालों अब फिर पहाड़ बोते हैं।

वो दहलीज़े जिन पर अक़्सर ईजा

त्यौहारों में बनाती थी गेरु और चावल पीस कर ऐपण,

चलो बैणियों,बोजियों उन्हें फिर से सजाते हैं,

खो गया है जो एक लंबे अर्से से उसे वापस फिर से लाते हैं/

वो हुक़्क़े जो गुड़गुड़ाते थे बड़बाज्यू कभी बरामदे में...

 अब जिनकी गुड़गुड़ नहीं सुनाई देती बड़बाज्यू के कमरे से,

चलो उसकी गुड़गुड़ फिर 

वापस लाते हैं,

उन बौनालों में(आंगन ) जहाँ कभी बच्चे खेलते थे.... 

आज दिन में ही बानर, सुवर सोते हैं पहाड़ बोते हैं।

मोती-बिनुवा की वो जोड़ी,

लहलहाते गेहूँ-धान, मडुवा-झूंगर

जिससे पलता पेट सालभर।

धूल जमे उस हल को चलो फिर से खेतों में चलाते हैं,

वो बैलों की जोड़ी जिसने फाड़ पाथरों को...

बना हमारे खेत जोते हैं, 

वापस उनको गोठों में ला चलो फिर से पहाड़ बोते हैं/

ओ मेरे हिमालवासियों चलो फिर से पहाड़ बोते हैं।


©®सुधा जोशी"रजनी"

   ग्राम-कोट,पो.ऑ.-ताड़ीखेत

   जिला-अल्मोड़ा(उत्तराखण्ड)