कब तुमने श्रृंगार किया था

कब दर्पण में मुख देखा था

जीवन की विकल तृषा में

तो ही तुमने सुख देखा था।

यह सावन आकांक्षित है!!

एक युग से मुझे प्रतीक्षित है

तुम बन कर बरखा आओ

अब हृदय अति उल्लसित है

रिमझिम फुहार सी बरसो

मेरे अंतर्मन में तुम हरसो।

कह दो सब मन की आशा

न हृदय रहे अपना प्यासा।।