सब कुछ संभालने वाले

कहाँ मिलते हैं ?

मिलते हैं अपनी जरूरत से

बने हुए रिश्ते नाते,

अंतर्मन की गांठें, औे परतें

कहाँ रखूं, ले जाकर,

रखने को नकदी, जेवरात

मिल जाता बैंक लॉकर,

सुदीर्घ काल तक के लिए भी

मियादी जमा योजना,

यह परंपरा रही है हमारी

सेठ - साहूकारों से,

मंदिर, धर्मशालायें तक

संभालती रहीं हैं धरोहर

पर कोई ऐसा मित्र,

या फिर हम राज़दार

नहीं मिलता कहीं भी,

जिसके पास रख सकें

अपने मन के विचार,

एक होना चाहिए

अपना ऐसा साझीदार।