घाट-घाट जाती है किश्तीअपना हाल सभी से कहतीपर कोई न है सुनने वालाऊपर अंबर है नीचे धरतीअपनी सुनाओ तुम कैसी होजैसा सोचा बिल्कुल वैसी होप्रीत-राग की चूनर ओढ़ेपनघट की लहरों जैसी होवासंती परिधान तुम्हारामृदुल मनोहर शैलूषी हो