मेरे हाथों में ताजे गुलाब

उसकी ख्वाहिश भी थी

मेरी जरूरत भी 'अनाम'

गुलाबों की खुशबू से ही

महका रहता था अंतर्मन

जब कभी हम होते पास

भूल जाते सुधि और तन

रोज गुलाबों की तलाश

में बासी हुआ  ऊबा मन

हर सुबह उस का चेहरा

हथेली में  थाम लेता हूँ

तरल आकांक्षा से पूरित

उसकी सहज स्निग्धता

मेरी आँखों से उतर कर

स्थायी स्मृति बन गयी है

उसकी साँसों की खुशबू

की तरह अब ख्यालों में

मुझे फारस के गुलाबों से

उम्दा उसकी देह गंध है।