किताबो का ये सन्नाटा पाठक जानता है
तेरी सूरत से ग़ज़ल पढ़ना पाठक जानता है
न मिल सकी जिस्म की सिलवटे तो क्या हुआ
तेरी रूह के रास्ते, ये मुसाफिर जानता हैं
तेरी हंसी का दर्द, तेरे अश्को की बूंद का अमृत
तेरे दिल की गहराई , ये शख्स जानता है
मिट भी जाऊंगा तो दुआ निकलेगी लब से
कीमत मेरी मौत की, दुश्मन जानता है
वो कमजोर नही जो झटककर कपड़े घर चला गया
उसके घर की जिम्मेदारी वो बखूबी जानता है
काटकर गर्दन लोगो की, मुआवजा बाटता हैं
हुकूमत की कीमत सिर्फ बादशाह जानता हैं


