कल मंगल को बैठे बैठे मन में ये दंगल घूम रहे थे

नहीं नियंत्रित, हम यहां, अमंगल को कर पाते

और हम कोस करोड़ों जाके मंगल में मंगल ढूंढ रहे थे!


मिटा रहे थे उनको, जो पृथ्वी पर जंगल फूल रहे थे

काट काट कर धरती पर, उगते हरे भरे पेड़ों को

हम पागल रॉकेट से जा, मंगल पर जंगल ढूंढ रहे थे!


प्रकृति बांधने, हम नित्य नई कोई संगल ढूंढ रहे थे

पटका जब प्रकृति ने अब, सब गिरे पड़े हैं औंधे मुंह

और भूल गए हैं कि हम मंगल पर मंगल ढूंढ रहे थे!


लें प्रण कि पहले पृथ्वी की जल और वायु तो स्वच्छ बनाएंगे

प्रकृति मुस्कायेगी तो इक दिन हम मंगल पर भी कक्ष बनाएंगे।