धूप
कल टहलते छत पर मुझको
बचपन वाली धूप मिली
पर थोड़ा सा वो मुरझाई थी
यूं तो पहले जैसे थी
पर आज झिझक वो मुस्काई थी।
मैं बैठा उसकी गोदी में
और मैंने पूछा
सुनती हो मेरी प्यारी धूप बुआ
क्यूं उदास तुम रहती हो
क्या तुमको भी कोई रोग हुआ।
धूप हंसी और बोली
नहीं बेटा मुझको कोई रोग नहीं होता
मैं तो ख़ुद हूं सबकी दवा दुआ
बस पहले से सब कुछ कितना बदल गया ना
यही सोच के थोड़ा सा अफ़सोस हुआ।
पहले जब मैं आती थी छत आंगन पर
मुझको कई लोग मिला करते थे
राह मेरी तकती थीं दादी नानी
देख मुझे गमलों में फ़ूल खिला करते थे
अब तो सब कुछ बदल गया है।
छत पर बेल हरी लौकी गिलकी की
कुछ तुलसी के पौधे और बगिया आंगन की
मुझसे मिलकर झूम झूम मुस्काती थीं
मेरे आते ही चाची मौसी बुआ दीदी
रोज़ सुखाने अपनी पापड़ वड़ियां लाती थीं।
घर के बूढ़े दद्दा जी पीठ मेरी किरणों में करके
पुस्तक या अख़बार पढ़ा करते थे
कुछ बच्चे पतंग खेलते थे मुझमें
और कट जाए तो आपस में ख़ूब लड़ा करते थे
पर अब तो सब कुछ बदल गया है।
फिर पूछा उनने, बेटा क्यों सब बदल गया है ?
क्या आंगन और छत अब बनते नहीं
या घर बनने का लहज़ा, अब बदल गया है
क्या घर के बूढ़े अब अख़बार नहीं पढ़ते
या परिवारों के रहने का ढंग अब बदल गया है।
बातें करते करते, गला भरा तो अपने आंचल से
ख़ुद को ही वो पंखा झलती बोली
क्या नए ज़माने में पापड़ वड़ियां कोई नहीं खाता
क्या धूप सूखा कर गेहूं को
बाद पिसाने आटा अब चक्की कोई नहीं जाता।
बेटा अगर तेरी कोई बात यहां सुनता हो
तो बोल ना सबसे, मैं ज्यादा वक्त नहीं लूंगी
एक नहीं तो आधा घंटा तो बैठो मुझमें
मैं वादा करती हूं बस सुख ही दूंगी
और हर लूंगी रोग कई, एक टका नहीं लूंगी।
एक टका नहीं लूंगी।।
~ इक़बाल सिंह...✍️


