रातों के साए कुछ गुन गुनाए
महकती हैं सारी ये फ़िज़ाएं 

कुछ तो बोलों तुम मुझसे 
खोलों तुम अपनी बंद जुबाएं

रखा नहीं हैं कुछ भी इश्क़ में
चल हम दोनों कुछ कमाएं

कभी तुम लौटों गांव को अपने
राह में तुम्हारी हम फूल सजाएं

कुछ तो ऐसा सरकार कर दें 
शहर से शिक्षा गांव को आएं

कुछ तो ये शामें कह रहीं हैं
आओ तुमको हम समझाएं 

सूरज की किरणें पड़ती जब तुमपे 
तेरे चेहरे का और नूर बढ़ जाएं 

रहने दो पास तुम यादों को अपनी
डर हैं मुझे कि ये भी न छीन जाएं

रंगों का ही तो हैं मौसम ‘अंकित’
एक दूजे में आओ हम रंग जाएं 
© Ankswrites