हाथो में जब कलम होती है
घड़ियों की न कोई इल्म होती है
लिखता जा लिखता जा ए हमराही
लिखना भी तो उस खुदा की इबादद होती है
जब एक लेखक रातभर लिखता है
तभी ये देश हर सुबह जगता है
जब उठी थी ये कलम अंग्रेजी राज में
तभी सुलगा था वो जिस्म आग में
कितनी कलमे टूटी कितनी तोड़ी गयी
जिंदगी छोड़ दी पर कलम न छोड़ी गई
क्या होगा देश का उस दिन
जिस दिन ये कलम दम तोड़ देगी
जब एक कविता, जब एक कवि का
दामन छोड़ देगी
तब वो भखत फिर आएगा
गुलामी का परचम फिर लहराएगा
दुर्भाग्य है ए साहब ये मेरे देश का
क्योंकि ये बहरो का देश है
जनता बहरी नेता बहरे
औलाद बहरी माँ-बाप बहरे
भला इन बहरो को अब कैसे, कैसे आवाज लगाऊ
इन सोते हुए जिंदा मुर्दो को कैसे, कैसे जगाऊँ
अये दिन कोई दामिनी अपना दम तोड़ रही
आये दिन कोई न कोई औलाद अपने
बुजुर्ग मा बाप से रिश्ता तोड़ रही
आये दिन मेरी कलम लिखते हुए
मुझसे ज्यादा रोती है
रुक्जा और न लिख ये मुझसे कहती है
मैं फिर उसकी हौसला अफजाई करता हूँ
उसके बिना क्या हालात होंगे साक्षात्कार कराता हूँ
उसकी हिम्मत उसकी बंदगी की
सच मे दाद देनी होंगी यारो
मैं रुक जाता हूँ कभी कभी
मगर वो नही रुकती है