तड़प रही है आज धरती
मिलने को आसमान से
सूख गए हैं तन मन इसके
देखो वियोग की पीड़ा में |
सूझे हुए हैं नेत्र इसके
धुंधला धुंधला हैं हर दिशा
धुआ धुआ बेजान सा
बिखरा बिखरा सा है कुंतल इसका |
नासमझ व्याकुल प्रयासी ये
सन्देशा ले जाये ये पवन
दूर आसमान तक पहुंचाने को
लगता है यह भी विफल |
दिलासा देती प्रकृति सखी
प्यार की सहनाई बजाती
सेमल के पुष्प के रंग से
धरती सुहागन बन बैठी |
नए पल्लवों से सजे तने
पक्षी भी गाती विरह की संगीत
पतझर की शय्या पर प्यार की बारिश में
भीगने को राह निहारती धरती ||

