सदियों से गाथा अपमान की गाई जा रही है,
सुनो मानवी अब तुम्हारे सम्मान की लड़ाई है,
क्यों सहती हो इतना कष्ट तुम नारी,
उठो अब बारी विध्वंस की आई है ।।
ख़ुद का सोचे बिना शीश सदा तुमने झुकाएं है,
कोई समझे नहीं तेरी क्या उत्कंठाएं हैं,
हे नारी तुम दुखी क्यों होती हो ,
उठो अब बारी नए अपध्वंस की आई है ।।
तुम्हारे लिए आज संसार एक रणभूमि है,
कोई ना समझे यहां तेरी वेदनाएं हैं,
अश्रु रोक अब तुम कूच करो ,
उठो अब बारी युद्ध की आई है ।।


