*उजड़ा वृक्ष*

 

इस प्रकृति में उजड़ा वृक्ष खड़ा है,

कहता बार-बार आँधी से लड़ा है।

जब लगती कुल्हाड़ी

रक्त धार बहती,

आँसू दिखते न किसी को

श्वास रुक चली है।

पंछी का मनमोहक कलरव 

शांत हो चला है

छांव नही रही 

परछाई मुक्त

पत्ते गिरते चले है,

पतझड़ मेरे शरीर को

रक्त रंजित कर रहा है,

इस प्रकृति में उजड़ा वृक्ष खड़ा है।

 

कटते अंश मेरे जड़ सुख रही 

कैसे बताऊ मेरी रूह दुःख रही 

कच्चे-पक्के घर

पंडाल मेरे अंगों से सज रही है

लगाते कम पेड़ लोग झोली भर रहे

इस प्रकृति में उजड़ा वृक्ष खड़ा है,

कहता बार-बार आँधी से लड़ा है।

 

हरी-भरी पत्तियाँ मेरे मन से पूछ रही 

शाख डालियों के नन्हें बच्चे 

कहाँ छिप गये,

नन्ही सी चिड़िया का भार 

कोयल की कुहू पुकार

पपीहा का गान

आसमां में उड़ते थक हार गया है,

इस प्रकृति में उजड़ा वृक्ष खड़ा है,

कहता बार-बार आँधी से लड़ा है।

 

बच्चों की टोली अब कहाँ खेलती 

गम में खुशियों की मन्नत 

मेरी होली जलती है,

निःशब्द हो चला जमाना

किस पथ चला है,

मुश्किल से भरे जीवन का

अब अंत हो चला है,

इस प्रकृति में उजड़ा वृक्ष खड़ा है।

कहता बार-बार आँधी से लड़ा है।।.                युवा कवि

        लिकेश ठाकुर