रक्त तप्त युवाओं का ज़मीर,
जागृत होना चाहिये।
विभीषिका भविष्य से बचने,
श्रेष्ठ संस्कार होना चाहिये।।
घोर अँधियारा तप्त कंठ,
पंछी को नीर चाहिये।
धर्म निरपेक्ष हो भारत मेरा,
हर घर में वीर चाहिये।
अनुग्रह पूरित जन तटनी से,
राव,सिपाही होने चाहिये।
कर सकते दुश्मन को धराशयी,
भीमकाय पाँव ऐसे चाहिये।
केश लताएँ गिरि से विचल,
छाती फ़ौलाद सी चाहिये।
दामिनी सी चाल हो,
केसरी की दहाड़ चाहिये।
लग रही दुनिया कानन सी,
मिटाने षड्यंत्र वीर योद्धा चाहिये।
सायक गाण्डीव कर से चला सके,
महान अर्जुन चाहिये।
रक्त तप्त युवाओं का ज़मीर,
जागृत होना चाहिये।
विभीषिका भविष्य से बचने,
श्रेष्ठ संस्कार होना चाहिये।।
तरु सा आँचल ममता की कोख़,
कुसुम खिलना चाहिये।
मरूत से चल मूर्धा सा मन,
सभ्य युवा चाहिये।
शोणित सा तन इरादे बुलंद,
व्योम सा मन चाहिये।
मिथ्या अभिमान को चूर करने वाला,
ओजस्वी वीर चाहिये।
मुनासिब हो ऐसा न्याय संगत,
स्तम्भ हिमालय सा चाहिये।
आस्मिता को धवल बना सके,
महान वीर युवा चाहिये।
पतन से उत्थान की ओर ले जाये,
ओजस्वी प्रधान चाहिये।
सौभाग्य स्वाधीन सा भारत,
सुराज सृष्टि चाहिये।
मानवीय संकोचन की प्रकृति,
अब बदलनी चाहिये।
मलिन दनुज,मृत दैत्येन्द्र को मिटाने,
श्रेष्ठ संस्कार चाहिये।
रक्त तप्त युवाओं का ज़मीर,
जागृत होना चाहिये।
विभीषिका भविष्य से बचने,
श्रेष्ठ संस्कार होना चाहिये।।