जब भी चाहा है

टूटकर चाहा है


शायद इसलिए आखिर में

मुझे ही तोड़ जाते सब


पता नहीं मुझसे बेरुखी दिखाते वक्त

क्यूं कापते नहीं उनके लब


उधेड़बुन में रहता हूं अक्सर

क्या कभी इन सब का हिसाब होगा ए रब