सजल नयन व्याकुल है मन,

जाने कौन जतन कर रोक श्याम को लूं,

सोच रही सखि खड़ी, क्या कर जतन,

स्वयं को जोड़ श्याम संग लूं,

प्रीत श्याम की में हुई बेसुध सी,

भरी दही की मटुकिया, नीर भराए चली,

कांटे लगे पग में,

वो उलझाए चीर फटाए चली,

इत बने श्याम निर्मोही,

आज जाए परसो आवन की कहते हैं,

व्याकुल हैं पशु पक्षी सभी,

चितचोर आज चित्त चुराते हैं

कौन समझाए मात यशोदा को,

बची स्वांस किंतु प्राण हरते जाते हैं।