पाताल लोक के बच्चे 


इनका पैदा होने एक गुनाह है

इनका हक्क सिर्फ़ जफ़ा है

खुदाई भी काँप उठे जिससे देख कर

इनको ऐसा मुक़द्दर विरासत में मिला है



वो जो कहते के जानते है इस्स देश को

वो ज़रा जाके देखे इनके हाल को

शर्मिंदा होती है अक्सर इंसानियत

जब देखती है धरती पे बसे पाताल को


कभी झांक के देखता नहीं कोई उनकी आँखों में

कभी सर पे हाथ कोई फेरता नहीं

यह इस्स आज़ाद देश के वो क़ैदी है

जिन्हें अपना बचप्पन तक मिला नहीं


माँ बाप ही पीट ते है जानवर किंटरह

चुभती है गालियाँ कानो में ख़ंजर की तरह

और अगर बच भी गए इन सब से तो

ग़रीबी निगल लेती है समंदर की तरह



उनकी मासूमियत तार तार होती है

हवस के पंजो का शिकार होती है

दर्द सहने के और कोई आसरा नहीं

ज़िंदगी चरस के नशे से लाचार होती है


मझब और जाति के नाम पर

ऊँचे लोग नीचता की हर हद्द पार करते है

और हक़ के लिए जो उठा लिया सर कभी

टोह जिहादी या नक्सली कहके मारते है


यह कैसी बस्ती है कैसे गाऊँ है यह कैसे शहेर है

जातमझब ओर हुकूमत के पैरो तले हर गरीब का सार है

कभी फ़ुरसत हो तो सोचना इनके बारे में

जो रोज़ चाप चाप पीते यह जहेर है