नन्हे- नन्हे पैर लेकर
आई मैं धरती पर थी,
क्या पता,
लड़की नहीं अभिशाप
बन गुंजुंगी मैं,
खुशियों की सौगात लगाए
खिलखिलाती मैं रही,
क्या पता,
लड़कियों को उड़ने का ,
हक़ नहीं,
निराशा ने घेरा मुझे
मैं बेड़ियों को टाँग खड़ी रही।
इतना सब जानकर मैं घोर निराशा में थी तभी एक नया सवेरा मुझे नयी दिशा में ले गया, वो आता सूरज मेरी आत्मा बन गया। सूरज की किरणें मुझमें समां गयी, मेरी शक्ति को जगा गई।
अगर यह सूरज डूब के फिर आ सकता है अपनी शक्ति को गिरने के बाद भी समेट, फिर बिखेर सकता है तो मैं क्यों नहीं? सोचते-सोचते मैं बहार आई, एक पेड़ के नीचे बैठकर मैं सोचती ही रह गई कि मेरी नज़र चिटियों की कतार पर गई। वे बार- बार गिर रही थी पर फिर उठ रही थीं। जब इतने छोटे जीव हार नही मान सकते तो मुझमे तो बहुत शक्ति है। मुझे डर नहीं अब गिरने से। वो डायलॉग है न- मुझे गिरना है, उठना है ,सीखना है, हरना भी है पर रुकना नही है।
बेड़ियो को तोड़ दिया मैंने आज। बदलाव लाने से मुझे अब कोई रोक नहीं सकता। हाँ, यह मुहिम पहले शायद मुझे अकेले छेड़नी पड़े। पर कहते हैं न- मैं अकेले ही चला था जानिबे मंजिल पर लोग मिलते गए और कारवाँ बनता गया।
आज हाथ उठा,
सबको सलाम करती,
मैं चली गयी
मुहिम छेड़
सबको अपने
कारवाँ में शामिल
करती गयी,
मंजिल अभी दूर है
पर क्या पता
यह चमत्कार भी
होता चले।


