“मैं मानव”
मैं मानव,
एक अंतहीन सोच,
कभी धृष्ट, कभी भ्रष्ट,
कभी मौलिक,
ना जिसका और ना छोर।
एक अणु समग्र संसार का,
एक बिंदु इस धरा का,
अस्तित्व ही क्या मेरा,
ना कोई आलेख,
ना विषय चिंतन का।
धर्म-कर्म से बंधा हुआ,
प्रारूप नश्वरता का,
कभी आस्तिक, कभी नास्तिक,
एक अनदेखे बंधन से,
कुछ बंधा हुआ सा।
क्रोध, मोह, लालसा से,
जकड़ा असंख्य जंजालों से,
छल-कपट भरे विचारों से,
विचलित निज भँवर में
परास्त अपने मन से।
धुप्प फैले अंधियारों में,
बैठा क्यूँ विचारों में,
दिशा समेटे अपने मन में,
खोजता पथ, थका-चोटिल,
पथिक! निर्जर जीवन वन में।
मैं अभिशापित जन्म से,
होऊँ पावन अब अनल से,
देह मिट्टी का मिला पंचतत्व में,
विलीन करूँ स्वयं को,
ईश्वर के पावन पद में,
अब और ना विलम्ब करूँ,
जीवन-पाश से अब क्यूँ डरूँ,
आशा यही बची मन में,
बना रहूँ अपनों की स्मृति-चिह्न में,
अब त्याग करता मैं तमस् का,
प्रकाश पुंज को ग्रहण मैं करता।
मैं मानव,
एक अंतहीन सोच,
अंत समय में, प्रबुद्ध, अबोध,
ना संताप, ना प्रलाप,
बस एक विचार अंकित,
कुछ विस्मित,
समय के चक्र से अनुग्रहित,
मैं मानव।


