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“हाल-ऐ-ज़िंदगी”

Lalit SarswatLalit Sarswat December 16, 2022
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हाल--ज़िंदगी


थे कभी ज़िंदा दिल हम भी  मेरे दोस्त,

अब ज़िंदा रहने का बहाना ढूँढने में लगे हैं।


एक ज़माना थाजी लिए जी भर कर,

अब वक़्त भी उधार लिए जी रहे हैं,

थी कोशिशें लाख़ कशिश को पाने की,

अब साँसें भी गिन गिन कर जी रहे हैं।


तमन्ना-चाहत थीकुछ कर गुज़रने की,

अब कुछ हौंसला बटोरनें में लगे हैं,

ज़ुनूने-इंक़लाब था हर सोच में एक वक़्त,

अब रहम की गुंजाइशों में लगे हैं।


रंजिशें थीमोहब्बत थीदिल जिंदा था,

अब एक रूह की तलाश में लगे हैं,

अश्क़ थेगीले शिकवे भी थे किसी से,

अब प्यासेदरिया की तलाश में लगे

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